Tuesday, June 16, 2009

लिट्ल मोर आडॅसिटी

बिल माअर अमेरिका के शेखर सुमन हैं. या ऐसे भी कहा जा सकता है कि शेखर सुमन भारत के बिल माअर हैं. माअर का टॉक शो 'पॉलिटिकली इनकरेक्ट' नब्बे के दशक में खासा लोकप्रिय रहा है. अमेरिकी समाज से धार्मिक कट्टरता दूर करने, वैज्ञानिक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के लिए शुरू किये गए दि रीज़न प्रोजेक्ट से भी वे जुड़े हैं.
गड्ड-मड्ड राजनैतिक विचारों के बावजूद बिल माअर की व्यंग्य-दृष्टि काबिल-ए-तारीफ़ है. आजकल वे एचबीओ पर एक कार्यक्रम 'रियल टाइम विद बिल माअर' कर रहे हैं. इसके ताज़ातरीन प्रसारण में उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा को निशाना बनाया. अमेरिकन टेलिविज़न पर ओबामा के छाये रहने की बात से मुझे उस दौर की याद आ गयी जब प्रधानमंत्री राजीव गाँधी दूरदर्शन पर छाये रहते थे. वास्तविक मुद्दों को सुलझाने में ओबामा के ढुलमुल रवैये को लेकर माअर ने उनकी ज़बरदस्त खिंचाई की है और उन्हें थोड़ा 'बुशपन' लाने की सलाह भी दी है.


और हाँ, संस्थागत धर्म के कटु आलोचक माअर ने पिछले साल एक डॉक्युमेंटरी रिलिग्युलस भी बनाई थी जो काफी चर्चित हुई.

Sunday, May 03, 2009

गीत और संघर्ष के 90 साल

आज पीट सीगर 90 साल के 'जवान' हो गए. फ़रवरी में उनके ग्रैमी अवार्ड जीतने पर में यह पोस्ट किया था.
आज फिर उनको सलाम करते हुए सुनते हैं 'ग्वान्तानामेरा'. वैसे तो इस स्पैनिश गीत को कई अमेरिकी और लातिन अमेरिकी कलाकारों ने गाया है मगर मुझे सीगर का संस्करण सबसे ज्यादा पसंद है. शुरुआत में सीगर इस गीत के रचयिता होसे मार्ती के बारे में बताते हैं. और अपनी बेमिसाल 'कन्वर्सेशनल' शैली में इस गीत को गाते हुए इसके अंग्रेजी भावानुवाद से भी श्रोताओं को परिचित कराते हैं.पीपुल्स वीकली वर्ल्ड में सीगर के सम्मान में लिखा गया जॉन पिएतारो का आलेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.

Wednesday, April 15, 2009

अब्राहम लिंकन के बहाने अशोकन फेयरवेल

अब्राहम लिंकन की गणना अमेरिका के महानतम राष्ट्रपतियों में होती है. गृह युद्ध के उथल-पुथल भरे दौर में राष्ट्रपति रहे लिंकन ने अलगाववादी दक्षिणी राज्यों के समूह (कंफेडरसी ) के खिलाफ संघ को विजय दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई. इसी अनुषंग में उन्हें अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने के लिए भी याद किया जाता है. गत फ़रवरी में लिंकन की द्विशती मनायी गयी.
अमेरिका के प्रचलित इतिहास में गृह युद्ध भावनाओं को उभारने वाला अध्याय है. प्रचलित इतिहास इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक वह इतिहास भी है जिसे जन-इतिहास या पीपुल्स हिस्ट्री कहा जाता है. महान अश्वेत नेता फ्रेडरिक डगलस ने लिंकन के बारे में कहा था कि "विशुद्ध दासता-विरोधी दृष्टिकोण से देखा जाए तो लिंकन मंद, रूखे, सुस्त और उदासीन प्रतीत होते हैं. मगर देश की जन-भावना के हिसाब से नापा जाए- वह भावना जिस पर ध्यान देने के लिए एक राजनीतिज्ञ के तौर वे बाध्य थे- तो वे तेज़, उत्साही, रैडिकल और दृढ़संकल्प थे."
केन बर्न्स ने गृह युद्ध पर बड़ी शानदार डॉक्युमेंटरी बनायी है. पीबीएस चैनल पर 1990 में हुआ इसका प्रसारण चार करोड़ लोगों ने देखा और आज भी इसकी गिनती पीबीएस के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रसारणों में होती है.इस डॉक्युमेंटरी में एक धुन पार्श्व में कई बार सुनाई देती है और सुनने वाले को अवसाद से भर देती है. जे उन्गर द्वारा रचित इस धुन का नाम 'अशोकन फेयरवेल' है; यह एक शोकगीत है. ये एकल वायोलिन से शुरू होती है और बाद में गिटार का स्वर भी इसमें जुड जाता है.
यूट्यूब पर अशोकन फेयरवेल के कई संस्करण मौजूद हैं. यहाँ सुनते/देखते हैं वह संस्करण जो किसी ने लिंकन को श्रद्धांजली के तौर पर पोस्ट किया है. 144 सालों पहले आज ही के दिन अब्राहम लिंकन की हत्या हुई थी.


Friday, March 27, 2009

जॉन होप फ्रैंकलिन का निधन


गत 25 मार्च को अमरीकी इतिहासकार जॉन होप फ्रैंकलिन का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. अमेरिकी इतिहास में अश्वेतों को उनका उचित स्थान दिलाने में फ्रैंकलिन का महती योगदान है. नस्लवादी पूर्वाग्रह से ग्रस्त अमेरिका के दक्षिणी राज्य ओक्लाहोमा में पैदा हुए फ्रैंकलिन ने अश्वेतों के प्रति होने वाले भेद-भाव और दुर्व्यवहार को स्वयं अनुभव किया था. ऐसा ही एक कटु अनुभव उस समय का है जब बचपन में उन्होंने एक नेत्रहीन महिला को सड़क पार करने में मदद करने की कोशिश की. जब उन्होंने यह बताया कि वे अश्वेत हैं तो उस महिला ने घृणा से उनका हाथ झटक दिया.

अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में वह जिम क्रो कानूनों का दौर था.  जिम क्रो कानूनों के अनुसार सरकारी स्कूलों, सार्वजनिक शौचालयों, बसों, ट्रेनों, रेस्तराँ और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर श्वेत और अश्वेत लोगों के लिए अलग व्यवस्था थी. ये कानून कहने को तो अश्वेतों को 'पृथक मगर बराबर' (सेपरेट बट ईक्वल) दर्जा देते थे मगर मूलतः ये नस्लवादी मानसिकता का प्रतीक थे. 

'ब्राउन विरुद्ध बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन' केस को बीसवीं सदी के अमेरिकी इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है.  अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1954 में दिए गए इस केस के फैसले में श्वेत और अश्वेत बच्चों के लिए अलग स्कूल व्यवस्था को गैर-बराबरी पर आधारित घोषित कर समाप्त किया गया.  इस ऐतिहासिक फैसले ने नागरी अधिकार आन्दोलन के लिए ज़मीन तैयार की.  इस मुक़दमे के लिए अश्वेत समुदाय की ओर से युक्तिवाद और तर्क सामग्री तैयार करने में फ्रैंकलिन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. 

1947 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'फ्रॉम स्लेवरी टू फ्रीडम' आज भी अमेरिका में अश्वेत समुदाय के इतिहास का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है. 1995  में उन्हें अमेरिका के सर्वोच्च नागरी अलंकरण 'प्रेसिडेंट्स मेडल ऑफ़ फ्रीडम' से सम्मानित किया गया.

 

 

चित्र: नेशनल आर्काइव्ज़ एंड रिकार्ड्स एडमिनिस्ट्रेशन (यू एस ए) से साभार.
 

Wednesday, March 25, 2009

सेसर शावेज़ की याद में



 
31 मार्च सेसर शावेज़ का जन्मदिन है. मेक्सिकन मूल के इस अमेरिकी मजदूर नेता  ने उचित मजदूरी  और काम की  परिस्थितियों में सुधार के लिए खेतिहर श्रमिकों को संगठित किया.महात्मा गाँधी से गहरे प्रभावित शावेज़ ने 1962 में नेशनल फार्म वर्कर्स असोसिएशन की स्थापना की जिसका नाम बाद में बदल कर यूनाईटेड फार्म वर्कर्स कर दिया गया. आज यूनाईटेड फार्म वर्कर्स अमेरिका में खेतिहर मजदूरों की अग्रणी यूनियन है. शावेज़ की अगुवाई में यूनाईटेड फार्म वर्कर्स ने खेतिहर मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए कई आन्दोलन चलाये.
इस महान नेता के सम्मान में उनके जन्म-दिन पर अमरीका के आठ राज्यों में अवकाश होता है. यूनाईटेड फार्म वर्कर्स ने 31 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग की है.  इस मांग के समर्थन के लिए अमेरिकी जनता के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है.


http://www.ufwaction.org/campaign/chavezholiday09


Sunday, March 22, 2009

वो जो नहीं है किसी जैसा

फ़रोग फरोखज़ाद की कविताएँ शिरीष जी ने पिछले हफ़्ते अनुनाद पर पोस्ट की थीं. आज शहीदों को याद करते हुए उनकी एक और कविता (मूल फ़ारसी के माइकल सी. हिलमन द्वारा किये गए अंग्रेजी अनुवाद से अनूदित) प्रस्तुत है.

वो जो नहीं है किसी जैसा

मैंने एक ख़्वाब देखा कि कोई आ रहा है.
मैंने एक लाल सितारे को ख़्वाब में देखा,
और मेरी पलकें झपकने लगती हैं
मेरे जूते तड़कने लगते हैं
अगर मैं झूठ बोल रही हूँ
तो अन्धी हो जाऊँ.
मैंने तब उस लाल सितारे का ख़्वाब देखा
जब मैं नींद में नहीं थी,
कोई आ रहा है,
कोई आ रहा है,
कोई बेहतर.

कोई आ रहा है,
कोई आ रहा है,
वो जो अपने दिल में हम जैसा है,
अपनी साँसों में हम जैसा है,
अपनी आवाज़ में हम जैसा है,
वो जो आ रहा है
जिसे रोका नहीं जा सकता
हथकड़ियाँ बाँध कर जेल में नहीं फेंका जा सकता
वो जो पैदा हो चूका है
याह्या के पुराने कपडों के नीचे,
और दिन ब दिन
होता जाता है बड़ा, और बड़ा,
वो जो बारिश से,
वो जो बून्दों के टपकने की आवाज़ से ,
वो जो फूलों के डालियों की फुसफुसाहट में,
जो आसमान से आ रहा है
आतिशबाज़ी की रात मैदान-ए-तूपखाने में
दस्तर-ख्वान बिछाने
रोटियों के हिस्से करने
पेप्सी बाँटने
बाग़-ए-मेली के हिस्से करने
काली खाँसी की दवाई बाँटने
नामज़दगी के दिन पर्चियाँ बाँटने
सभी को अस्पताल के प्रतीक्षालयों के कमरे बाँटने
रबड़ के जूते बाँटने
फरदीन सिनेमा के टिकट बाँटने
सय्यद जवाद की बिटिया के कपड़े देने
देने वह सब जो बिकता नहीं
और हमें हमारा हिस्सा तक देने.
मैंने एक ख़्वाब देखा.

Sunday, March 15, 2009

थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ

'थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ' याद है? अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित सपनों और हकीकत की यह लिरिकल दास्तान पहली बार दूरदर्शन पर बहुत पहले देखी थी. हॉलीवुड म्यूजिकल के अंदाज़ में बनाई गयी यह अनूठी फ़िल्म मन के किसी कोने में धँस गयी. अभी दो-तीन सालों पहले अपने जर्सी सिटी वाले गुजराती भाई की वीडियो लाइब्रेरी से लाकर यह फ़िल्म फिर देखी. और चार-छः महीनों पहले यूट्यूब के सौजन्य से टुकडों-टुकडों में देखी.

भयंकर गर्मी से झुलसा हुआ बारिश के लिए तरसता मध्य भारत का एक पहाड़ी क़स्बा, एक 'ज़रा-हटके' या पारम्परिक सन्दर्भों में अति-साधारण लड़की जो शादी की उम्र पार करने को है, एक सम्वेदनशील मगर चिन्तित पिता, एक बिलकुल 'बड़े भैया टाइप' बड़े भैया, एक जवान होता छोटा लड़का जिसे बड़े भैया बच्चा ही मानते हैं. फिर एंट्री होती है 'धृष्टधुम्न पद्मनाभ प्रजापति नीलकंठ धूमकेतु बारिशकर' की. यह बड़बोला ठग उनके घर में घुस आता है और पाँच हज़ार रुपयों के बदले मात्र 48 घंटों में बारिश करवाने की गारण्टी देता है. बड़े भैया और बिन्नी उसे झूठा और मक्कार कहते हैं मगर पापा और छोटा बेटा मानते हैं कि ट्राई करने में क्या हर्ज़ है. और उस एक गर्मी की रात में बारिशकर बिन्नी को उसके अन्दर की सुन्दरता से परिचित करवाता है, उसे अपने सपनों में विश्वास करना सिखाता है. जवान होते लड़के में वह इतना आत्म-विश्वास भर देता है कि ज़रुरत पड़ने पर बड़े भैया को घूँसा भी मार सके.

फ़िल्म के बिलकुल असली लगने वाले पात्र ,काव्यमय संवाद और छोटे-छोटे मधुर गीत इसे अद्भुत 'फेअरी टेल' का रूप देते हैं.'पोएट्री इन मोशन' शायद इसे ही कहते होंगे. फ़िल्म के अंत में बड़ी साफगोई से अमोल पालेकर ने यह बता दिया कि इस फिल्म की कथा अंग्रेजी फिल्म/नाटक ' दि रेनमेकर' से ली गयी है.
इसीलिए बड़े दिनों से 'दि रेनमेकर' देखने का मन था; कल रात वो भी देख ली. 1956 में बनी, जोसफ अन्थोनी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है केथरीन हेपबर्न और बर्ट लैन्कस्टर. यह फ़िल्म भी अच्छी लगी, विशेषकर केथरीन हेपबर्न का शानदार अभिनय. वैसे अपने देसी संस्करण में अनीता कँवर ने बहुत अच्छा अभिनय किया है, परन्तु हिन्दी उच्चारण की त्रुटियों को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो यह फिल्म नाना पाटेकर की है. एक लवेबल लम्पट की भूमिका उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ निभाई है. मगर 'फेअरी टेल' शायद अपनी भाषा में ज्यादा मोहक लगती है. यह अंग्रेजी फ़िल्म देखकर फिर एक बार अमोल पालेकर को सैल्यूट करने का मन हुआ. लगा कि हॉलीवुड फ़िल्मों की कॉपी करने की अमोल पालेकर जैसी कला (और ईमानदारी भी) अन्य निर्देशकों में भी आ जाये.
हिन्दी फ़िल्म का टाइटल गीत बहुत मधुर है और बोल भी उतने ही आकर्षक है. यूट्यूब पर बानगी देखिये (वीडियो में तस्वीर शायद इसे अपलोड करने वाले सज्जन की ही है). वैसे तो पूरी फिल्म ही यूट्यूब पर उपलब्ध है.