Tuesday, June 27, 2006

घुसपैठ

ब्लॉग तैयार किए हुए लगभग दो महीने हो गए हैं. कस्बाई मन खुद को ब्लॉगिस्तान की सरहद पर दो महीनों से 'नो मेन्स लैण्ड' में पार्क किए हुए था.आगे बढने को तैयार ही न हो.'नो मेन्स लैण्ड' में खडे होने के अपने फ़ायदे हैं. ना पासपोर्ट की झंझट, ना वीज़ा का लफडा और ना नागरिकता की चिंता.वी आइ पी अंडरवियर बनियान की तरह ये भी 'आराम का मामला है'.

पिछले दो सालों से लिखना ऐसे छूट गया है कि उंगलियों ने दीवार पर सिन्दूर से 'शुभ-लाभ','श्री गणेशाय नम:' या 'श्री लक्ष्मीजी सदा सहाय' तक नहीं लिखा.रचनाधर्मिता से अवैध सम्बन्ध रहे हैं मगर अब मुद्दत हो गई है यार को मेहमाँ किए हुए. न कोई नाजायज़ सन्तानें ही हुईं रचनाधर्मिता से, जो फिर मेल करा दें.

मगर अभिनव पीछे पडे रहते हैं कि लिखो (और पोस्ट भी करो). पिछले महीने रचनाधर्मिता से रास्ते में निगाहें मिलीं, घर पहुँचकर दौरा पडा, उबकाई हुई और लैपटाप पर कविता टपक पडी.अब अभिनव लगातार लगे रहे कि कविता ब्लॉग पर पोस्ट करो और कस्बाई मन नित नए बहानों के शिखण्डियों की सेना खडी करता रहा.पिछले रविवार जब अल्टिमेटम मिला कि एक हफ़्ते में यह काम न हुआ तो कविता 'निनाद गाथा' पर पोस्ट कर दी जाएगी, तब कहीं कस्बाई मन 'नो मेन्स लैण्ड' से कँटीली बाड फाँद कर ब्लागिस्तान की धरती पर घुसपैठियों की तरह कूदने को तत्पर हुआ.

मैनहटन-१

मेरे बेडरूम की खिडकी से
'मैनहटन' नजर आता है,
अपनी गरिमा से बह्ती हुई
'ह्डसन'
जिसके दूसरे छोर पर खडा
'मैनहटन'
अपनी आकाश से गाली-गलौच करती
अट्टालिकाओं के साथ
मुझे
मुँह में सिगार दबाए,
रेशमी स्लीपिंग रोब पहने,
फिल्मी नायिका के
उस रौबदार बाप जैसा लगता है
जो कहना चाहता है,
'मेरी बेटी का पीछा छोडने की तुम क्या कीमत लोगे?'
मैं अधिक समय तक उससे नजरें नहीं मिला सकता
घबराकर आँखें नीची कर लेता हूँ.
बेवकूफ़ होती हैँ
खिडकियाँ
जो चाह्ती हैं
दिखाना
बाहर का दृश्य
जस का तस.
बचपन में
मेरे घर की खिडकी से
कारखाना
दिखाई देता था
'रामायण-महाभारत' के
राक्षसों-दानवों की तरह
डरावने(?) स्टीम इंजन
काले धुँए के बादल छोडते हुए
चार-बारह,बारह-आठ का
साइरन बजते ही
तेल-धूल-कोयले से
सने कपडों में
ड्यूटी पर जाते
या बाहर आते
मजदूर.
खिडकियाँ
क्यों होती हैं
इतनी मुँहजोर?
जो उस पार की चीजों को
इस पार
ले आना चाहती हैं.
'हडसन' के पानी पर
तैरता जहाज
धुँआ बिल्कुल नहीं छोडता,
बिल्कुल भी नहीं
मगर लगता है
कई बार
जैसे जहाज
कालिख उगलने वाले
दैत्यरूपी
इंजन में बदल जाएगा
और
बेडरूम की खिडकी का काँच
तोडकर
मेरे सिरहाने
आ बैठेगा
और करेगा
मुझसे
वो सारे सवाल
जिनके जवाब
ढूँढने के लिए
मुझे
काले धुएँ से गुजरकर
मालगाडी
के उस डिब्बे पर
चढना होगा
जिसमें भरा है
टनों
कोयला.
पता नहीं क्यों
मुझे कभी कभी
धोखेबाज़ लगती हैं
खिडकियाँ.
जब बादल छा जाते हैँ
तो
मैनहटन
उसमें ऐसे डूबता सा लगता है
जैसे
किसी शरारती बच्चे ने
तस्वीर की
इमारतों की ऊपरी मंज़िलों पर
मटमैला रंग छलका दिया है.
बादलों के धुंधलके में
बडा कमज़ोर और बीमार सा
लगता है
मैनहटन,
मैं ज़रा नार्मल होने लगता हूँ
मगर जानता हूँ मैं
कि जब हवा
राम-बुहारी बन
बादलों को झाड देगीऔर
सूरज वैकेशन से लौट आएगा
तब मैनहटन फ़िर
ग़ुरूर से
दमकने लगेगा
मुझे नीचा दिखाने के लिए.
'एम्पायर स्टेट' की चोटी पर
जलता बुझता
बिजली का बल्ब
मुझे चिढाने लगेगा,
अपनी हज़ारों वाट रोशनी
के साथ
मैनहटन
पूरी रफ़्तार से
मेरी तरफ़
आता दिखाई देगा
और
मैं घबराक्रर
'विन्डो-ब्लाइंड'
नीचे गिरा दूँगा.
सौंदर्य बोध
निहायत ही
घटिया होता है
खिडकियों का
और मेरे बेडरूम की खिडकी के पास
तो सौंदर्य बोध है ही नहीं.

18 comments:

अभिनव said...

वाह भारतभूषण जी,

कविता पोस्ट करने के लिए धन्यवाद। पढ़कर अच्छा लगा।
पर बात यहीं रुकनी नहीं चाहिए, आपके व्यंग्यों का 'कस्बाई मन' पर बड़े मन से इंतजा़र रहेगा।
हिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है।

अभिनव

मिर्ची सेठ said...

भारतभूषण जी,

हिन्दी ब्लॉगमंडल में पहली पोस्ट के महूर्त पर बधाई। लिखते रहिए पढ़ने वाले बहुत हैं। कभी कभी लगेगा कि भाई लिख तो रहा हूँ पर कोई टिप्पणी नहीं मिल रही तब भी लिखते रहिएगा :D

मिर्ची सेठ said...

साथ ही आपके चिट्ठे के बारे में नारद जी को बता दिया है

नारद | रखे सबकी खबर
वे निगाह रखेंगे व आप की नई नई प्रविष्टियों के बारे में तीनों लोकों में गुणगान करते रहेंगे।

पंकज

ई-छाया said...

अरे वाह भारतभूषण जी, बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता, हमारा सौभाग्य कि आप हिंदी चिठ्ठाजगत में पधारे। आपका हार्दिक अभिनंदन है।

Raviratlami said...

बढ़िया मैनहटनी कविता है!

Raman Kaul said...

सुस्वागतम्!

उन्मुक्त said...

अंग्रेजी मे कहावत है Cross the Rubicon - रबिकन तो पार हुआ|
स्वागत|

शैलेश भारतवासी said...
This comment has been removed by a blog administrator.
शैलेश भारतवासी said...

भूषण जी,
आपने हिन्दी-अंग्रेजी शब्दों का अपनी कविता 'मैनहटन" में अति सुन्दर प्रयोग किया है। सराहनीय प्रयास है। मुझे लगता है आपने खूब लिखा होगा। हमारे जैसे ब्लॉगर लिखने-पढ़ने को भूखे हैं, आप लिखते रहिए ताकि हम भूखों को भोजन मिलता रहे।
एक बात ध्यान रखिएगा, टंकण के समय मात्रात्मक अशुद्धियाँ ना हो पाये नहीं तो हिन्दी प्रेमी आपको छोड़ेंगे नहीं। हार्दिक स्वागत करता हूँ।

संजय बेंगाणी said...

बहुत खुब.
आपका स्वागत हैं हिन्दी चिट्ठा-जगत में.
लिखते रहें.

Hindi Blogger said...

स्वागत है! अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा.

अनूप शुक्ला said...

अच्छा तो आप हैं भारत भूषण तिवारी जिन्होंने हमसे हरिशंकर परसाई का लेख टाइप करवाया था। 'अबे कस्बाई मन' से-लगता है निराला के अनुयाई हैं(अबे सुन बे गुलाब)'अरे ए मेरे तमाशाई मन '-लगता है मुक्तिबोध की कविता( ओ मेरे आदर्शवादी मन!)का विस्तार होगा। बहरहाल,स्वागत है आपका हिंदी ब्लागजगत में! आशा है आप तमाम साथियों की मनुहारों के ख्याल रखते हुये नियमित लेखन जारी रखेंगे।

रत्ना said...

नो मैनज लैंड पर दोनों तरफ की गोलियों का भी डर होता है , अच्छा किया जो तार फांद इधर आ गए । देखिए कितने साथी स्वागत के लिए खड़े है । बेहद अच्छा लिखते है आप ।

Pratik said...

भारतभूषण जी, हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। आशा है आपकी क़लम (की-बोर्ड) ऐसे ही निरन्तर चलती रहेगी।

Tarun said...

भूषण स्वागत है, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है। आशा है ऐसा ही कुछ और पढ़ने को मिलेगा।

रेलगाड़ी said...

सही लिखे हो तिवारी जी! स्वागत है ...और जन्मदिन की बधाइयाँ!

priyankar said...

सचमुच अच्छी कविता .

Pratyaksha said...

आज ही आपका चिट्ठा देखा । बिक्रम द कॉस्मोपोलिटन और शरद जोशी के शब्द , वाह ! आनंद आया